(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.63. अध्यायः 063
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरम्प्रति हिंसाभावेपि ब्रह्महत्याप्राप्तिप्रतिपादकव्यासवचनानुवादः॥ 1 ॥


Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

युधिष्ठिर उवाच।

इदं मे तत्त्वतो राजन्वक्तुमर्हसि भारत।
अहिंसयित्वाऽपि कथं ब्रह्महत्या विधीयते॥ 13-63-1(83964)
भीष्म उवाच। 13-63-2x(6988)
व्यासमामन्त्र्य राजेन्द्र पुरा यत्पृष्टवानहम्।
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि तदिहैकमनाः शृणु॥ 13-63-2(83965)
चतुर्थस्त्वं वसिष्ठस्य तत्त्वमाख्याहि मे मुने।
अहिंसयित्वा केनेह ब्रह्महत्या विधीयते॥ 13-63-3(83966)
इति पृष्टो मया राजन्पराशरशरीरजः।
अब्रवीन्निपुणो धर्मे निःसंशयमनुत्तमम्॥ 13-63-4(83967)
ब्राह्मणं स्वयमाहूय भिक्षार्थे कृशवृत्तिनम्।
ब्रूयान्नास्तीति यः पश्चात्तं विद्याद्ब्रह्मघातिनम्॥ 13-63-5(83968)
मध्यस्थस्येह विप्रस्य योऽनूचानस्य भारत।
वृत्तिं हरति दुर्बुद्धिस्तं विद्याद्ब्रह्मघातिनम्॥ 13-63-6(83969)
गोकुलस्य तृषार्तस्य जलार्थमभिधावतः।
उत्पादयति यो विघ्नं तं विद्या** ह्मघातिनम्॥ 13-63-7(83970)
यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यकू शास्त्र वा मुनिभिः कृतम्।
दूषयत्यनभिज्ञाय तं विद्याद्ब्रह्मघातिनम्॥ 13-63-8(83971)
आत्मजां रूपसम्पन्नां महतीं सदृशे वरे।
न प्रयच्छति यः कन्यां तं विद्याद्ब्रह्मधातिनम्॥ 13-63-9(83972)
अधर्मनिरतो मूढो मिथ्या यो वै द्विजातिषु।
दद्यान्मर्मातिगं शोकं तं विद्याद्ब्रह्मघातिनम्॥ 13-63-10(83973)
चक्षुषा विप्रहीणस्य पङ्गुलस्य जडस्य वा।
हरेत यो वै सर्वस्वं तं विद्या *** घातिनम्॥ 13-63-11(83974)
आश्रमे वा वने वाऽपि ग्रामे वा यदि वा पुरे।
अग्निं समुत्सृजेन्मोहात्तं विद्याद्ब्रह्मघातिनम्॥ ॥ 13-63-12(83975)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि त्रिषष्टितमोऽध्यायः॥ 63 ॥


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